Saturday, June 15, 2013
काबिनी के तेंदुए
जिसने तेंदुआ न देखा उसने क्या जंगल देखा ! मैंने पूर्व में कई बार कान्हा, बांधवगढ़ और रणथमभोर के जंगलों में तेंदुआ देखा था परन्तु वो सिर्फ एक झलक मात्र या फिर कुछ क्षण भर का मौका था जिसमे साफ़ फोटो ले पाना असंभव था। जंगल के सबसे सुन्दर और बिल्ली परिवार के सबसे मुश्किल से दिखने वाले सदस्य की एक अच्छी तस्वीर लेने का प्रयास अन्ततः, कर्नाटक के नागरहोले टाइगर रिज़र्व के काबिनी के जंगलो में पूरी हुई । मैं और मेरे वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर मित्र बैजू पाटिल, हम दोनों साथ में कई जंगलो में वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी कर चुके थे और पहली बार काबिनी जा रहे थे, दोनों के मन में एक ही बात थी, की एक बार तेंदुए की एक अच्छी तस्वीर मिल जाये।
काबिनी, नागरहोले (राजीव गाँधी राष्ट्रीय उद्यान) का सबसे खूबसूरत भाग है जहाँ काबिनी नदी पर बने बाँध के कारण जंगल के अन्दर तक कई सारी छोटी छोटी धाराएँ बन गयी है जो कई प्रकार के पशुओं जैसे बाघ, तेंदुआ, हाथी, ढोल (जंगली कुत्ते), जंगली भैंसा (बाईसन), चीतल, सांभर, चोसिंघा, जंगली सूअर आदि को रहने एवं अपना भोजन ढूँढने के लिए सहायक हैं। दूधराज, मोर, सफ़ेद पेट वाला कटफोड़वा, भूरा कटफोड़वा, क्रेस्टेड सर्पंएंट ईगल, चेंजबल हॉक ईगल, वाइट रम्प शामा और पपीहा जैसे दुर्लभ पक्षी भी काबिनी में बहुतायत से मिलते है।
काबिनी में रुकने के लिए कई जंगल लॉज और रिसोर्ट बने हुए है जो वाइल्डलाइफ सफारी के लिए आने वाले मेहमानों को न सिर्फ ठहरने की अच्छी व्यस्था बल्कि अच्छे खाने के साथ साथ जंगल सफारी की सुविधा भी उपलब्ध करते हैं। हम भी काबिनी जंगल लॉज एंड रिसोर्ट में ठहरे थे। साफ़ सुथरे कमरे, अच्छा भोजन और साथ में काबिनी नदी के किनारे की ताज़ी हवा मिल जाने से हम लोग पहले की बड़े खुश महसूस कर रहे थे और अलगे दिन सुबह से शुरू होने वाली जंगल सफारी के लिए अपने कैमरा तैयार कर रहे थे, तेंदुए के कुछ अच्छे फोटो मिलने की कल्पना कर रहे थे ।
अगले दिन अल सुबह सफारी पर जाने के लिए हमारे गाइड, "अफसर खान" जिन्हें प्यार से सभी बिल्ली कैचर कहते है, जिप्सी के साथ हमारे कमरे के बाहर मौजूद थे, रिसोर्ट से निकलते समय मुहँ अँधेरे में ही ड्राईवर ने कुछ आवाज़ें सुनकर गाड़ी रोक दी और ध्यान से बगल के जामुन के पेड़ पर देखने पर कॉलर स्कॉप आउल का एक जोड़ा दिखा, अफसर के हिसाब से ये एक बड़ा अच्छा शगुन था, अफसर ने मजाक में हमसे कहा की जिस दिन उसे ये उल्लू का जोड़ा दिखता है उस दिन तेंदुआ ज़रूर दिखता है।
आगे करीब १ किलोमीटर पर राजीव गाँधी राष्ट्रिय उद्यान का एंट्री गेट था, तेंदुए को देखने के लिए हम सभी बेसब्र हो रहे थे तभी अफसर जो फारेस्ट अधिकारीयों से बात कर के आया था उसने हमे बताया की कल ही शाम को तेंदुए ने एक हिरण का शिकार किया था और उसे पॉवर लाइन के पास एक पेड़ पे रख कर खाया था, हमने भी ड्राईवर से उसी तरफ चलने को कहा। तेंदुआ, बेहद खूबसूरत जानवर होता है, उसकी ताकत और शान देखते ही बनती है। बाघ के विपरीत तेंदुए की चमड़ी पीलापन लिए हुए होती है और उस पर काले भूरे बेतरतीब रिंग्नुमा निशान होते है। तेंदुआ आमतौर पर छोटे जानवरों का शिकार करता है जैसे हिरन, जंगली सूअर के बच्चे, लंगूर। अपने शिकार को अन्य बड़े शिकारियों से बचाने के लिए तेंदुआ उसे पेड़ के शाखों के बीच छुपा देता है और वहीं बैठ कर आराम से खाता है। एक बार शिकार करने के बाद कई दिनों तक वह उसी शिकार को खाता है और करीब ४-५ दिन बाद अगला शिकार करता है, इसीलिए हमे पूरी उम्मीद थी की तेंदुआ अब भी वही आसपास ही होगा।
हम लोग पॉवर लाइन की तरफ चल पड़े, साथ में अफसर और ड्राइव को यह भी निर्देश थे की गाड़ी आराम से चलाये ताकी रास्ते में कुछ और जानवर या पक्षी मिले तो हम उनके भी फोटो खींच सके। बेहद खूबसूरत जंगल के बीच हम लोग धीरे धीरे चल रहे थे की तभी दायीं तरफ से बांस की शाखों के चटखने की आवाज़े आई, हम उत्साहित होकर बांस के झुरमुट की तरफ देखने लगे, वहां एक हाथी का छोटा बच्चा था जो बांस की पत्ती खा रहा था, हमे देख कर वो पीछे हट गया, एकदम से बांस में काफी हलचल शुरू हो गयी और ध्यान से देखने पर समझ में आया की यह तो हाथियों का एक पूरा झुण्ड है। इस झुण्ड में सोलह हाथी और बच्चे थे। हाथियों के झुण्ड की मुखिया एक बुज़ुर्ग मादा हथिनी होती है और परिवार के अन्य सदस्य उसके ही रिश्तेदार होते हैं। वयस्क नर हाथी कम ही झुण्ड के साथ रहते हैं, वयस्क होने पर नरों को झुण्ड से निकल दिया जाता है और वो अपने लिए नया झुण्ड तलाशने निकल पड़ते हैं। प्रकृति ने ये सब नियम इन्ब्रीडिंग को रोकने के लिए बनाये हैं ताकि झुण्ड के अन्दर प्रजनन न होने से आने वाली नस्लें मज़बूत और निरोगी रहें।
उन हाथियों की कई तस्वीरे लेने के बाद हम फिर तेंदुए की तलाश में निकल पड़े। टाइगर टैंक नाम के पानी के तालाब के पास हमने लाल मुंह के बंदरों का समूह देखा जो पानी पीने आया था, दुधमुहे छोटे बच्चे अपनी अपनी माँ से चिपके हुए थे और थोड़े युवा बच्चे एक दुसरे को पकड़ने के खेल में मस्त थे। पूरा समूह जोश से भरा हुआ उचल कूद कर रहा था। हमने ध्यान से देखा तो एक बन्दर एकदम ध्यान भरी मुद्रा में सबसे ऊँचे पेड़ पर बैठा सारे जंगल की निगरानी कर रहा था, वो सामान्य लग रहा था पर वो दूसरी दिशा में बड़े ध्यान से कुछ देख रहा था, हमने भी वहीँ रुकने का फैसला किया ताकी हम जंगल से आ रही आवाजें सुन सके और तेंदुए की मूवमेंट को समझ सके।
कुछ ही मिनिट बीते होंगे के वो बन्दर बैचन होकर "ख़र्र खो खो" ऐसी आवाज़े निकलने लगा जिसका साफ़ मतलब था की वो अपने समूह को जंगले की तरफ से आते खतरे से सचेत कर रहा था, इसे अलार्म कॉल करते हैं। तभी २ और नर बन्दर ऊँचे पदों पर चढ़ गए और चिल्लाने लगे, पूरा समूह क्षण भर में पेड़ पर चढ़ गया और पीछे की तरफ भागने लगा, हम जंगल के इन पहरेदारों को ध्यान से देख रहे थे ताकि कुछ अनुमान लगा सके की वो जंगल के किस शिकारी पशु को देख कर घबरा रहे हैं।
बंदरो की चीख पुकारों के साथ ही साथ कुछ सीटी बजने जैसी तीखी आवाज़े भी सुनाई देने लगी, अफसर को समझते देर न लगी की जंगली कुत्तो का एक झुण्ड शिकार की तलाश में हमारी तरफ आ रहा है। जंगली कुत्ते भी जंगल में कम ही दिखाई देते है। उस झुण्ड में ९ सदस्य थे, पूरा झुण्ड तालाब के पास आया और पानी पीने लगा। मै और बैजू पागलों की तरह फोटो खींचे जा रहे थे। कुत्तों का झुण्ड १५ मिनिट तक पानी पीने के बाद वापस जंगल की तरफ लौट गया। हमने हमारी किस्मत को धन्यवाद दिया और आगे बढ़ गये।
मेरे बर्ड फोटोग्राफी के शौक के कारण रास्ते भर मैं पक्षी देखता हुआ चल रहा था और बीच बीच में जिप्सी रुकवाकर फोटो भी खींचता जा रहा थ. मैंने रास्ते में कई पक्षियों की सुन्दर फोटो निकले उनमे सबसे अच्छा था सफ़ेद पेट वाला कटफोड़वा, ये पक्षी सिर्फ दक्षिण भारत के जंगलो में ही पाये जाते है। कटफोड़वा एक पेड़ के तने में अपनी चोंच से कीड़ो को निकाल निकाल कर खा रहा था। सुन्दर हरे बैकग्राउंड में कुछ बेहतरीन फोटोज मिल गये। पास ही के पेड़ पर मालाबार जायंट स्क़ुइरेल नाम की बड़ी लाल से रंग की गिलहरी के भी कई सुन्दर फोटो मिल गए।
फारेस्ट वालों द्वारा बताये गए तेंदुए के शिकार वाले क्षेत्र, "पॉवर लाइन" तक पहुँचने में १ घंटा बीत चुका था, सामने से आने वाली एक अन्य टूरिस्ट जिप्सी के गाइड ने हमे बताया की तेंदुआ १० मिनट पहले ही पेड़ से उतर कर जंगल में अन्दर चला गया है और अब शायद ही बाहर आये। मन ही मन मैंने सोचा की हमेशा ऐसा क्यूँ होता है की जब मई पहुँचता हूँ तो बस १० मिनट पहले जानवर वह से चला जाता है। फिर मैंने सोचा की ये सब तेंदुए को न देख पाने की झुंझलाहट है। दुखी मन से हम बैकवाटर की तरफ कुछ और जानवर देखने निकल पड़े।
बैकवाटर क्षेत्र काबिनी का सबसे खूबसूरत इलाका है, यहाँ कई जानवर पानी पिने आये हुए थे और नदी किनारे की नरम घांस को चर रहे थे, इन जानवरों में हाथियों का एक बड़ा झुंड, चीतल, सांभर के कई छोटे छोटे झुण्ड काफी आकर्षक लग रहे थे। हमने मन भर कर प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों की तस्वीरे खींची। तेंदुआ न देख पाने का दुख अब तक जा चुका था।
नदी का पाट काफी चौड़ा था लगभग ५०० मीटर, दूसरे किनारे पर साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था, दूरबीन से देखने पर समझ में आया की जंगली भैंसों का एक बड़ा झुण्ड किनारे की घांस को चार रहा था। बैजू ने उनके ५०० मिमी लेंस से बाईसन के कुछ बेहतरीन फोटो निकले। नदी के बीच एक सूखे पेड़ पर बैठे इबिस और पेंटेड स्टोर्क पक्षी बड़े ही सुन्दर नज़र आ रहे थे। हमने काफी समय वहीँ बिताया, सूर्य अब सिर पर आने लगा था, जंगल से बाहर आने का समय हो चला था और प्रसन्न मन से हम वापस रिसोर्ट की तरफ चल दिए। अफसर ने हमे कहा की तेंदुए न देख पाने से निराश होने की कोई बात नहीं है। काबिनी में बिरले ही लोग ऐसे होते हैं जो तेंदुआ नहीं देख पाते. हमने उसे बताया की हम शाम को भी सफारी में आना चाहते हैं।
अफसर दोपहर २ बजे वापस हमें लेने आ गया, बेहद भारी खाना खाने के बाद हम आराम कर रहे थे। बैजू टेंट के बाहर लगे झूले में सो रहे थे। उन्हें जगाने जाते समय मैंने वही पास ही में एक दूधराज पक्षी देखा। अत्यंत दुर्लभ दूधराज सफ़ेद रंग का बुलबुल के आकार का पक्षी होता है जिसकी लम्बी सफ़ेद पूँछ होती है और हवा में उड़ते समय किसी रिबन की तरह लहराती है। मै भागकर अपना कैमरा उठा लाया और फटाफट दूधराज को अपने कैमरे में कैद कर लिया।
हम तैयार होकर वापस जंगल की तरफ निकल पड़े और जंगल की शांति को चीरती हुई ग्रे जंगल फाउल की कर्कश ध्वनि सुनते हुए धीरे धीरे आगे जाने लगे। इस बार जिप्सी में हमारे साथ पड़ोस वाले टेंट में रुके हुए २ युवक भी थे, उनमे से एक पहली ही बार जंगल आया था और अति उत्साहित था, और रास्ते में आने वाले हर जानवर और पक्षी की फोटो खींचता जा रहा था। चलते चलते एक मोड़ मुड़ते ही वो चकित होकर पीछे की और देखकर "टाइगर टाइगर" चिल्लाने लगा। हम सब ने पीछे देखा तो एक बड़ा सा नर बाघ झाड़ियों में अन्दर की तरफ जा रहा था। यूँ तो मैंने और बैजू ने कई बार बाघ देखे हैं और उनकी फोटो निकली है परन्तु दक्षिण भारत का यह हमारा पहला बाघ था। हम कई मिनट तक उसे झाड़ियों के पीछे जाते हुए देखते रहे और आज क्या कमाल का दिन है यह सोचने लगे, आज सुबह से हम बाघ, हाथी, ढोल, हिरन, सांभर, बाईसन ये सभी जंगल के प्रमुख जानवर देख चुके थे और फोटो निकल चुके थे। बस अब सिर्फ तेंदुआ देखना बाकी था।
शाम होने तक हम जंगल में यहाँ-वहाँ घूमकर तेंदुए के निशान ढूंढ रहे थे, कई जगह हमे पंजे के निशान मिले, एक जगह स्केट भी मिली, २ बार लंगूरों और चीतल की अलार्म कॉल भी सुनी पर तेंदुए के दर्शन नहीं हुए। थोडा आगे जाने पर सामने से आती एक जिप्सी के सभी पर्यटकों के चेहरे खिले हुए दिख रहे थे जिसका साफ़ मतलब था की उन लोगो ने बाघ या तेंदुआ देख लिया है ।
पूछने पर उन्होंने बताया की थोड़ी देर पहले एक बड़ा नर तेंदुआ टाइगर टैंक रोड पर बिलकुल सड़क किनारे बैठा हुआ था। हमने अपना माथा पीट लिया, हम अभी ही उस सड़क से २ बार निकले पर शायद हम उस तेंदुए को नहीं देख पाए। यही खूबी है तेंदुए की जो उसको घोस्ट ऑफ़ द जंगल बनाती है। तेंदुआ अपनी खाल के रंग और चुप कर बैठने के तरीके से पर्यवेश में इतना घुल मिल जाता है की पुराने वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स भी आसानी से उसे देख नहीं पाते।
दूसरी जिप्सी के लोगो से बात करके एक बात तो पक्की हो गई की तेंदुआ ज़रूर टाइगर टैंक इलाके में ही है। हम वापस उसी तरफ चल दिए जहा से हम आये थे। रस्ते में एक फारेस्ट गार्ड मिला, वो पैदल ही जंगल में गश्त लगा रहा था। इन्ही गार्ड्स की मेहनत, जंगल के ज्ञान और जोखिम लेने के कारण ही आज भी जंगल और उनमे रहने वाले जानवर बचे हुए है। ये गार्ड्स २ ४ घंटे जंगल में रहते हैं और शिकारियों और लकड़ी चुराने वाले बदमाशों को जंगल से खदेड़ते रहते हैं। गार्ड ने हमे बताया की अभी ५ मिनिट पहले टाइगर टैंक की तरफ से चौसिंघा की अलार्म कॉल आ रही थी। चौसिंघा काफी छोटा हिरन प्रजाति का जानवर होता है और इसकी अलार्म कॉल सबसे पक्की होती है। हम गार्ड के बताये हुए इलाके की तरफ तेज़ी से चलने लगे। रस्ते में एक मादा भालू और उसके बच्चे ने हमारे सामने से सड़क पार करी और जंगले में भाग गये। इसके भी कुछ फोटो मैंने अपने कैमरे में क्लिक कर लिये।
तेंदुए की तलाश में पूरा दिन निकल चुका था और शाम ढलने लगी थी। हम सभी अब तेंदुए को देखने की उम्मीद खो चुके थे। अँधेरा होने लगा था और वापस लौटने का समय हो चला था। जंगल से बाहर की तरफ आते समय हमने देखा की ३ जिप्सी सड़क के एक तरफ खड़ी थी और टूरिस्ट, जिप्सी पर खड़े होकर पेड़ पर कुछ देख रहे थे। हम भी उस तरफ देखने लगे।
जब हमने वह देखा तो हमारे आश्चर्य की सीमा न रही, ऐसा लगा मानो हमारी इच्छा तेंदुए ने सुन ली थी और हमे दर्शन देने वह पहुच गया था, सामने बड़े पेड़ की मुड़ी हुई शाखा पर एक मादा तेंदुआ अपने छोटे बच्चे के साथ आराम से पाँव शाखा के दोनों तरफ लटकाकर बैठी हुई थी। छोटा शावक उसके पीछे बैठा हुआ अपनी माँ की ऊपर नीचे होती हुई पूँछ से खेल रहा था। हमने तेंदुआ माँ और शावक के कई फोटो लिए और इश्वर को इस दृष्य को हमे दिखाने के लिए धन्यवाद दिया और वापस अपने रिसोर्ट की तरफ लौट चले। वापस आने पर ऐसा लगा मनो इस एक दिन में सारे जंगल की सैर हो गयी और बाघ, तेंदुए, हाथी, ढोल, जंगली भैंसा सबसे दोस्ती हो गयी।
हम काबिनी और पास ही के जंगल बन्दीपुर में ६ दिन रहे और सच मानिये ये मेरे जीवन के ३० वर्षो में सबसे अच्छे ६ दिन थे।
कौस्तुभ ऋषि
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